मैं उस दुनिया को जगाने के लिए खुद को भस्म नहीं करूंगा जो मूर्खों को पालती है | Yagneshkumar Suthar | charotarnoavaj 2026
रुको! एक पल के लिए ठहरो और अपने चारों ओर देखो। क्या तुम्हें वह दिखता है जो मैं देख रहा हूँ?
एक ऐसा विश्व जहां सांस लेना भी महंगा हो गया है। जहां जीवित रहने के लिए पैसा कमाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक लोहे की जंजीर बन गया है।
हैरान मत होना, क्योंकि यह सच है।
आज से हजारों साल पहले, हमारे पूर्वज बिना किसी मुद्रा, बिना किसी मालिक के, प्रकृति की गोद में आज़ाद पंछी की तरह रहते थे। धरती सबकी थी और किसी की नहीं।
लेकिन देखो आज क्या हो गया है? इस सीमित, अनमोल धरती पर, मुट्ठी भर लोगों ने एक कृत्रिम जेल खड़ी कर दी है, जिसकी दीवारें 'पैसे' से बनी हैं। जीवन का अधिकार अब पैसे से खरीदना पड़ता है! यह सबसे बड़ा धोखा है, एक ऐसा झूठ जिसे हम 'सभ्यता' का नाम देते हैं।
हमें लगता है हम आज़ाद हैं, हमारे पास वोट है, हमारे पास सरकार है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक बड़ा, भव्य मायाजाल नहीं है? क्या असलियत यह नहीं कि कुछ कॉरपोरेट घराने और आर्थिक रूप से उच्च स्तर वर्ग, सरकारों की आड़ में, हमारे जंगल, हमारे पहाड़, हमारी नदियाँ और हमारा पसीना चुरा रहे हैं?
वे इसे 'विकास' का नाम देते हैं, लेकिन इस 'विकास' की कीमत हम धरती के ढहते कंकाल और जहरीली हवा में सांस लेकर चुका रहे हैं। उनका मुनाफा तो कुछ दिनों का है, पर तबाही हमेशा के लिए।
जरा गहराई से सोचो!
हम जो कुछ भी कर रहे हैं, क्या वह अनैच्छिक गुलामी नहीं है?
हमें 'विकल्प' देने का नाटक किया जाता है।
विकल्प! क्या वाकई?
अगर मैं इस खेल से बाहर निकलना चाहूँ तो क्या होगा?
भूख, बेघरी, सजा – यही इनाम है।
कल्पना करो, अगर मैं कल शादी करके एक बच्चे को जन्म दूं, तो उससे कोई पूछेगा कि वह इस व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहता है या नहीं?
नहीं!
उसकी सहमति के बिना ही उस पर एक अनुबंध थोप दिया जाएगा – पैसे कमाने का, टैक्स देने का, कानून मानने का, एक ऐसी मशीन में पुर्जा बनने का जिसे उसने चुना ही नहीं।
यह कैसा न्याय है?
यह कैसी व्यवस्था है जो हमारी जिंदगी ही नहीं, हमारी सोच भी खरीद लेना चाहती है?
हम प्रकृति के ऋणी हैं, लेकिन हम उसे लूट रहे हैं।
हम मानवता के विकास की बात करते हैं, लेकिन हर दिन चिंता, अवसाद और अकेलेपन में डूबते जा रहे हैं। फिर भी, यह राक्षसी व्यवस्था और अधिक उत्पादन, और अधिक उपभोग, और अधिक 'विकास' की मांग करती है, चाहे इसके लिए धरती माँ का कलेजा ही क्यों न चीर देना पड़े।
और यह सबसे दर्दनाक हिस्सा है: यह व्यवस्था हमारे शरीर का ही नहीं, हमारे मन का भी शोषण करती है। बचपन से ही हमें नंबरों में अपनी कीमत मापना सिखाया जाता है – अंक, वेतन, रैंक, प्रोडक्टिविटी। हम वो पल भूल जाते हैं जब हम बिना किसी मूल्यांकन के सिर्फ़ 'होते' थे।
जिज्ञासा अब 'बेकार' है, शांति अब 'समय की बर्बादी' है, आराम भी तभी मान्य है जब वह हमें कल और अधिक कुशल बना सके। यह दबाव हमारी सोच में ज़हर घोल रहा है। एक बार यह जीत गया, तो हमारे भीतर का इंसान हमेशा के लिए मर जाएगा।
प्रकृति को देखो!
पेड़ आसमान से मुकाबला नहीं करते।
नदियाँ एक-दूसरे से रेस नहीं लगातीं।
वे बस 'पूर्ण' होने तक बढ़ती हैं, फिर ठहर जाती हैं।
लेकिन हम मनुष्य, अपने बनाए कृत्रिम लक्ष्यों के पीछे, यह मान बैठे हैं कि ठहरना मौत है। और हम दौड़े चले जा रहे हैं, तब भी जब जमीन हमारे पैरों तले खिसक रही है।
मैं अक्सर सोचता हूँ – कितने लोग हैं जो इस घुटन भरे सच को महसूस करते हैं, लेकिन कह नहीं पाते?
कितने लोग रोज़ सुबह उठते हैं, दम तोड़ते हैं, और फिर रूटीन, मनोरंजन या किसी और व्यस्तता में यह एहसास दबा देते हैं?
कितने लोगों के मन में असली सवाल थे, जिंदगी को समझने की भूख थी, और उन्होंने उसे मार दिया क्योंकि वह 'पेट नहीं पाल सकती थी'?
मुझे डर है कि कहीं मैं भी उनमें से एक न हो जाऊँ।
डर इस बात का नहीं कि मैं दुख भोगूंगा, डर इस बात का है कि कहीं मैं अपनी आत्मा को छोड़ कर, सिर्फ अपने शरीर को बचाने की कवायद में पूरी जिंदगी न गुजार दूँ।
फिर भी, मैं अंधा नहीं हूँ।
मैं खुद भी इस व्यवस्था के औजारों का इस्तेमाल करता हूँ। मैं उसी जाल पर निर्भर हूँ जिसकी आलोचना करता हूँ। यह विरोधाभास मेरे भीतर रोज़ कचोटता है।
पिंजरे को पहचान लेना ही आज़ादी नहीं है, यह सिर्फ सलाखों को और साफ़ कर देता है। लेकिन एक बार जो देख लिया, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
अब मैं यह दिखावा नहीं कर सकता कि सब ठीक है। अगर मुझे जीने के लिए इस खेल में हिस्सा लेना ही पड़े, तो लूँगा, लेकिन यह खेल मेरे लिए यह तय नहीं करेगा कि असली क्या है, कीमती क्या है, और जिंदगी किस चीज़ के लिए है।
शायद मेरा विद्रोह अब चुप है। शायद यह है कि मैं अपनी जिज्ञासा को जिंदा रखूँ, नींव पर सवाल उठाता रहूँ, अपने उस हिस्से को सुनता रहूँ जो बाज़ार, राष्ट्र और पहचानों की बिक्री के लिए नहीं है। भले ही मैं कभी भौतिक रूप से भाग न पाऊँ, मैं अपने आंतरिक संसार को गुलाम नहीं बनने दूंगा।
मैं अपनी सोच को दो-आयामी, अपने दिल को लेन-देन का सौदा और अपने समय को अर्थहीन नहीं बनने दूंगा।
और अब आता है सबसे चौंकाने वाला, सबसे क्रांतिकारी सच, जो आपके होश उड़ा देगा!
गीता का ज्ञान पढ़ने और समझने के बाद, अगर मैं निष्काम भाव से दूसरों की भलाई के लिए जीऊँ, तो भी एक वक्त ऐसा आएगा – एक अपरिहार्य क्षण (जिसे टाला न जा सके) – जब मैं बिना किसी अपराधबोध के स्पष्ट सोचूंगा: अगर स्वार्थ की राह पर चलना ही विनाश है, तो मैं विनाश को गले लगा लूँगा, लेकिन मैं उन मूर्खों को जगाने के लिए खुद को पूरी तरह भस्म नहीं कर सकता, जो जगाए जाने के बाद भी स्वार्थ को ही पकड़े रहेंगे। मैं वह ऐतिहासिक भूल नहीं दोहराऊंगा जो दूसरों ने की – लोगों को ऊपर उठाने की आशा में सब कुछ न्योछावर कर दिया, और देखो आज वे लोग कहाँ खड़े हैं?
भगत सिंह को देखो! उन्होंने अपनी जवानी की कुर्बानी दे दी ताकि हम आज़ाद हवा में सांस ले सकें। और आज, वही लोग धर्म, जाति और राजनीतिक नेताओं के नाम पर लड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर बहस कर रहे हैं, उस आज़ादी का मजा ले रहे हैं जिसकी कीमत भगत सिंह ने अपने खून से चुकाई।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस को देखो! जिन्होंने आराम, सत्ता और सुरक्षा को ठोकर मारी, साम्राज्य की जड़ें हिला दीं। आज उनका नाम सिर्फ नारों और मूर्तियों में सिमट कर रह गया है – जब सुविधा हो, तो याद कर लो, और जब साहस और अनुशासन की जरूरत हो, तो भूल जाओ।
चाणक्य को देखो! जिन्होंने सत्ता, लालच और मानवीय मूर्खता को सबसे गहराई से समझा। वे भी जानते थे कि भीड़ ज्ञान से नहीं, सिर्फ परिस्थितियों के दबाव में बदलती है।
और स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को देखो! जिन्होंने धर्म का पूर्णता से पालन किया, अथाह त्याग किया, और फिर भी विश्वासघात, गलतफहमियाँ, वनवास और अपनी ही कहानी में विकृति को नहीं रोक पाए, उन लोगों के हाथों जो उन्हें भगवान मानते हैं।
यह सब देखने के बाद क्या समझ आता है?
यह कि समस्या मिसालों की कमी नहीं थी। समस्या अज्ञानता नहीं थी। समस्या यह है कि मूर्ख सच्चाई नहीं चाहते, वे सुविधा चाहते हैं। वे मुक्ति नहीं चाहते, वे फायदा चाहते हैं। कोई उनके लिए सब कुछ जला दे, वे सिर झुकाकर प्रशंसा करेंगे, और फिर जैसे ही उन्हें मौका मिलेगा, उसी स्वार्थी खोल में वापस घुस जाएंगे।
इतिहास साफ है। जिन्होंने खुद को जलाकर रोशनी दी, उनका सम्मान तो हुआ, लेकिन उनका अनुसरण कभी नहीं हुआ।
उनकी कुर्बानियाँ कहानियाँ बन गईं, परिवर्तन नहीं।
उनका दर्द प्रतीक बन गया, सबक नहीं।
इसलिए नहीं, अब मैं यह नहीं मानता कि खुद को नष्ट करने से मानवता जाग जाएगी।
मैं इतना अहंकारी नहीं हूँ कि सोचूँ मैं वह कर लूँगा जो ये महान लोग नहीं कर सके, और मैं इतना मूर्ख भी नहीं हूँ कि उस प्रयोग को दोहराऊँ जिसके नतीजे खून से लिखे जा चुके हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि मैं स्वार्थी बन जाऊँगा।
इसका मतलब है कि मैं सटीक बन जाऊँगा।
मैं धर्म के मार्ग पर चलूँगा, लेकिन मूर्खों के लिए शहीद नहीं बनूँगा।
मैं निष्काम कर्म करूँगा, लेकिन अपने जीवन को उस समाज की भट्टी में ईंधन नहीं बनने दूँगा जो विकास करने से इनकार करता है।
अगर दुनिया सुधरेगी, तो इसलिए कि लोगों ने खुद बढ़ना चुना, न कि इसलिए कि मैंने उन्हें खींचने की कोशिश में अपना सब कुछ खत्म कर दिया।
कृष्ण ने कभी अंध-बलिदान नहीं माँगा; उन्होंने कर्म के फल की आसक्ति से बचने को कहा।और आज, 'दूसरों को उठाने' की आसक्ति भी एक और अहंकार का जाल बन गई है। मैं अपना रास्ता साफ-साफ चुनूंगा, भले ही वह एकांत की ओर ले जाए, भले ही वह विनाश की ओर ले जाए, लेकिन मैं उन लोगों के लिए अंतहीन रक्त नहीं बहाऊंगा जो बलिदान को कमजोरी और ज्ञान को असुविधा समझते हैं।
अगर यह मुझे अलग-थलग कर दे, तो कर ले। अगर यह मुझे गलत समझा जाए, तो समझा जाए। लेकिन मैं अतीत की वह भूल नहीं दोहराऊंगा – उन मूर्खों को सब कुछ दे देना, जो जागृत होने के बाद भी स्वार्थ को ही अपना धर्म चुनेंगे।
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जैसा की मैंने आपको ऊपर कहा की हम सब गुलामी में जी रहे है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह गुलामी कितनी गहरी है?
क्या आप जानते हैं कि आपकी अपनी 'मर्जी' और आपकी 'आज़ादी' नाम की चीज़ भी अब किसी और के इशारे पर नाच रही है?
आइए, कुछ ऐसे ही चौंकाने वाले सच देखते हैं जो आपकी रूह कंपा देंगे।
1. शिक्षा का जहर: अंग्रेजों की वो चाल जो आज भी जारी है (Macaulay's Poison)
मैकाले ने सिर्फ एक शिक्षा प्रणाली नहीं दी, उसने एक जहर दिया। 1835 में, उसने कहा था, "हमें ऐसे भारतीयों का एक वर्ग बनाना होगा जो खून और रंग से भारतीय हों, लेकिन स्वाद, राय, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ बनें।" उसने सफलतापूर्वक एक ऐसी प्रणाली बनाई, जहाँ आप अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म महसूस करते हो, और अंग्रेज़ी बोलना 'बुद्धिमानी' समझा जाता है। यह उसी जहर का असर है कि आज भी देश के अधिकांश लोग ऋषियों-मुनियों की विद्या को 'अंधविश्वास' समझते हैं, लेकिन पश्चिम के हर अध्ययन को 'विज्ञान' की संज्ञा देते हैं। यही वह जड़ है, जहाँ से 'विवेक' का ह्रास शुरू हुआ।
2. पढ़ाई नहीं, पिसाई: K1L9 वायरस का कारखाना (Education System)
हमारी शिक्षा प्रणाली देखो! एक बच्चे को कक्षा में बैठाकर उसकी तुलना दूसरे 60 बच्चों से की जाती है। इस तुलना से क्या पैदा होता है? ईर्ष्या (Jealousy), घमंड (Ego), क्रोध (Anger), लालच (Greed)। यही वह K1L9 वायरस है, जो बच्चे के मन में दया, करुणा, प्रेम और सहनशीलता को मार डालता है।
नतीजा?
एक स्वार्थी इंसान, जो सिर्फ नंबरों के पीछे भागता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे बताया गया कि नंबर ही उसकी पहचान है। यही वह विवेकहीनता है, जो आगे चलकर देश में अपराधों की जड़ बनती है। सोचो, क्या सच में एक परीक्षा में फेल होना, इंसानियत में फेल होने के बराबर है?
3. मनोरंजन या मानसिक पतन? (Entertainment Industry)
बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को देखो। 'एनिमल' जैसी फिल्में, जो खून-खराबा, गाली-गलौज और अस्वस्थ रिश्तों को ग्लैमराइज़ करती हैं, करोड़ों कमा रही हैं।
सोचो, जब हर फिल्म में हीरो सिगरेट पीता है, शराब पीता है, और हर दूसरे दृश्य में एक आइटम सॉन्ग होता है, जहाँ महिला के शरीर के अंगो को वासनाओ की दृष्टि से दिखाए जाते हैं, तो एक युवा क्या सीखेगा? 'आज की रात मज़ा हुस्न का...' जैसे गाने सीधे-सीधे एक निमंत्रण नहीं हैं?
और जब वही युवा, किसी की बहन या माँ को उसी नज़र से देखने लगे, तो हैरान मत होना। यह मनोरंजन नहीं, मानसिक पतन का कारखाना है। यही वह चीज़ है जो रेप जैसी वारदातों की मानसिकता को बढ़ावा देती है। ये सब देखने के बाद भी मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य ये होता है की कोई इसका विरोध क्यों नहीं करता? मुर्ख है क्या सब के सब?
4. मीडिया का दोगलापन: TRP के लिए बिकता सच (News Platforms)
मीडिया वाले आपको सच दिखाने का नाटक करते हैं, लेकिन असल में वे आपकी सोच को नियंत्रित करने का काम करते हैं।
आर.जी. कार मेडिकल कॉलेज केस हो या सुशांत सिंह राजपूत का केस, मीडिया इसे तब तक हवा देता है, जब तक इससे TRP मिलती है। फिर अचानक ये मामले गायब हो जाते हैं।
क्यों?
क्योंकि इन मीडिया हाउसों के मालिक कोई और नहीं, बल्कि बड़े-बड़े व्यापारी और राजनेता होते हैं। वे आपको बांट कर रखना चाहते हैं, आपको उलझा कर रखना चाहते हैं, ताकि आप असली सवाल न पूछ सकें कि आखिर न्याय कहाँ है?
आखिर महंगाई क्यों बढ़ रही है?
यह मीडिया का खेल है, और आप इस खेल के मोहरे हैं।
5. दलाल सियासत और 'मेंढक' बनी जनता (Government & Politics)
राजनेता जनता के लिए काम नहीं करते, वे तो बस अपनी कुर्सी बचाने के लिए करतब करते हैं।
ये 'उबलते पानी में मेंढक' वाली कहानी की तरह है। पानी धीरे-धीरे गरम होता है, और मेंढक को पता ही नहीं चलता कब वह मर जाता है।
यहाँ मेंढक आप हैं - जनता।
और गरम होता पानी है - महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार। राजनेता आपको धर्म और जाति के नाम पर बांट कर रखते हैं, ताकि आप एकजुट होकर उनके खिलाफ आवाज़ न उठा सकें। क्या आपको नहीं लगता कि यह सबसे बड़ी साज़िश है?
6. व्यापारियों की लालच: अंधेरे मनोविज्ञान का खेल (Greed of Businesses)
क्या आप जानते हैं कि आपकी हर ख्वाहिश कोई और बना रहा है?
व्यापारी आपको बेचने के लिए डार्क साइकोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया पर आने वाले वो रील्स, जो आपको घंटों बांधे रखते हैं, वो आपके दिमाग की कमज़ोरी को टारगेट करते हैं। 'लिमिटेड ऑफर', 'सिर्फ दो बचे' - ये झूठ है।
वे आपकी असुरक्षा (insecurity) और आपके डर को भुनाते हैं।
सबसे बड़ा खेल?
औरत के शरीर को एक वस्तु (commodity) की तरह इस्तेमाल करना, हर चीज़ बेचने के लिए - कार से लेकर साबुन तक। जब पुरुष की वासना और औरत की सुंदरता की चाहत व्यापार का ज़रिया बन जाए, तो समाज का पतन तय है।
7. धर्म के नाम पर धंधा: जब आस्था बन जाती है कैंसर (Religion)
सबसे संवेदनशील, लेकिन सबसे ज़रूरी सच। धर्म के नाम पर आपको बांटा जा रहा है। असली धर्म तो 'धारण' करना है, लेकिन आज धर्म ने हमें 'विभाजित' कर दिया है।
इस्लाम में 'हलाला' को देखो। एक औरत, तलाक के बाद अपने पहले पति के पास वापस जाने के लिए, किसी दूसरे आदमी से शादी करे, फिर उससे तलाक ले? क्या यह उस औरत की गरिमा का हनन नहीं? क्या वह एक गुड़िया है, जिसे खेल-खेल में इस्तेमाल करके फेंक दिया जाए? अगर यह नियम आपकी माँ या बहन के लिए होता, तो क्या आप इसे मानते?
हिंदू धर्म के ठेकेदारों को देखो। एक कहता है मेरा भगवान श्रेष्ठ, दूसरा कहता है मेरा। वे भूल जाते हैं कि कण-कण में व्याप्त उस परमात्मा को सीमित करने का प्रयास ही सबसे बड़ा पाप है। मूर्ति पूजा के पीछे की भावना को समझे बिना, लोग सिर्फ रीति-रिवाज़ निभा रहे हैं।
ईसाइयत और इस्लाम दोनों ही कहते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी है। अगर ईश्वर हर जगह है, तो वो एक मूर्ति में क्यों नहीं हो सकता? और अगर वो हर जीव में है, तो जानवरों को मार कर खाना, या उनकी बलि देना, क्या ईश्वर की हत्या नहीं है? क्या यह हमारी स्वार्थी प्रवृत्ति नहीं है?
सारे धर्म कहते हैं ईश्वर दयालु है, क्षमाशील है। फिर वह उन लोगों को क्यों जलाएगा जो उसे नहीं मानते? क्या कोई पिता अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए जला देगा, क्योंकि उन्होंने उसे पिता नहीं माना? यह विरोधाभास हमें बताता है कि असली धर्म तो मनुष्यता है, बाकी सब राजनीति का खेल है।
8. आप! आप ही सबसे बड़ी समस्या और समाधान हो (YOU!)
हाँ, आप। आप ही वह व्यक्ति हो, जो रील देखता है, फिल्म देखता है, भड़काऊ खबरें पढ़ता है, और फिर सवाल पूछता है कि देश में बलात्कार क्यों हो रहे हैं?
आप ही वह हो, जो 'जय श्री राम' के नारे तो लगाते हो, लेकिन अपने कर्तव्यों से भागते हो।
आप ही वह हो, जो दूसरे धर्म वालों से नफरत करते हो, लेकिन अपने धर्म के असली सार को जानने की जहमत नहीं उठाते।
पिछले कुछ दिनों में मैंने एक महिला से बात करी थी और तब मैंने जो जाना... क्या कहु?
सोचो, एक 36 साल की महिला रो रही थी कि उसके बच्चे बड़े होकर उसे अकेला छोड़ देंगे।
क्यों?
क्योंकि उसने और उसके पति ने, बच्चों को पैसे दिए, फोन दिए, लेकिन समय नहीं दिया।
उन्होंने बच्चों को प्यार करना नहीं सिखाया, उन्हें इंसानियत नहीं सिखाई। और आज उन बच्चों के लिए, माता-पिता एक बोझ मात्र रह गए हैं।
अब फैसला आपका
भगत सिंह, नेताजी, चाणक्य और राम सब ने अपना कर्तव्य निभाया। उन्होंने अपने समय में रास्ता दिखाया। लेकिन उनका बलिदान तब तक बेकार है, जब तक आप नहीं बदलते। यह देश, यह समाज, आप जैसे करोड़ों लोगों से मिलकर बना है।
अगर आपने अपनी सोच, अपनी आदतें, अपना स्वार्थ नहीं बदला, तो कोई कृष्ण, कोई राम भी इस देश को नहीं बचा सकता।
यह व्यवस्था आपको गुलाम बनाना चाहती है।
यह चाहती है कि आप वासना, क्रोध, लालच और अहंकार में जिएं।
क्योंकि गुलाम आसानी से कंट्रोल होते हैं।
लेकिन अगर आप जाग गए, अगर आपने विवेक जागृत कर लिया, तो यह व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी।
तो मैं फिर पूछता हूँ - क्या आप वो मूर्ख हो, जो जगाए जाने के बाद भी स्वार्थ में डूबे रहोगे?
या आप वो इंसान बनोगे, जो खुद को बदल कर, अपने परिवार को, अपने समाज को और अंततः इस पूरे राष्ट्र को बदलने की शुरुआत करेगा?
फैसला आपका है। अगर यह लेख पढ़ने के बाद भी आप वही रील्स देखते रहे, वही फिल्में देखते रहे, और वही राजनीतिक नारे लगाते रहे, तो समझ लीजिए कि आप उसी जंजीर में जकड़े हुए हो, जिसे आप खुद नहीं देख सकते। और फिर, देश की दुर्दशा पर रोने का आपका कोई अधिकार नहीं है।
"स्वयं को जानो, स्वयं को बदलो, यही सच्ची क्रांति है।"

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